‘‘यूज आॅफ टैक्नोलाॅजी फाॅर रिड्यूसिंग लैण्डस्लाइड इंडयूज्ड लौसेस’’ विषयक एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन

0
2632
Reading Time: 1 minute
देहरादून, 24 सितम्बर 2018(जि.सू.का.)-  विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा भू-स्खलनों के न्यूनीकरण एवं सरंक्षण हेतु प्रयुक्त की जा रही नवीनतम तकनीकों व शोध कार्यों को साझा कर एक विस्तृत योजना बनाये जाने के दृष्टिगत उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण एवं आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबन्धन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में जनपद स्थित एक स्थानीय होटल में ‘‘यूज आॅफ टैक्नोलाॅजी फाॅर रिड्यूसिंग लैण्डस्लाइड इंडयूज्ड लौसेस’’ विषयक एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला में डी.एम.एम.सी के अधिशासी निदेशक डा. पीयूष रौतेला द्वारा राज्य में घटित बड़े भूस्खलनों के इतिहास व उनसे हुयी व्यापक क्षतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने 1880 के नैनीताल भूस्खलन व 1893 में चमोली में निर्मित गौना ताल से आमजन व सार्वजनिक परिसम्पत्तियों के सुरक्षित बचाने हेतु अपनाये गये उपायों पर चर्चा की। नैनीताल में हो रहे भू-स्खलन/भू-धसाव के लिये उन्होंने बढ़ते अतिक्रमण व अनियोजित विकास को जिम्मेदार ठहराया। डा. रौतेला द्वारा उत्तराखण्ड में पृथक भूस्खलन संस्थान बनाये जाने की भी पुरजोर वकालत की।
हैस्को के संस्थापक एवं प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पद्मश्री डा. अनिल प्रकाश जोशी ने राज्य के पारिस्थितकीय तंत्र को बेहद संवेदनशील बताया। इसके संरक्षण के लिये उन्होंने नीति नियंताओं से धरातल पर कार्य किये जाने की वकालत की। सीमित संसाधन वाले आपदा प्रबन्धन विभाग को डा. जोशी द्वारा आधुनिकतम संसाधनों के बल पर सुदृढ़ किये जाने पर जोर दिया। आपदाओं के लिये मानवीय क्रियाकलापोें को सीधा जिम्मेदार मानते हुये उन्होंने मानव केन्द्रित सोच के बजाय प्रकृति केन्द्रित सोच विकसित किये जाने की बात कही।
कार्यशाला में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्थान, कोलकाता के निदेशक डा. पंकज जैसवाल ने बताया कि नेशनल लैण्डस्लाइड ससैप्टीब्लेटी मैपिंग प्रोग्राम के अन्तर्गत उत्तराखण्ड के भूस्खलन संवेदनशील क्षेत्रों के लिये 1ः50000 स्केल पर मानचित्र विकसित किये गये जिनका उपयोग भूस्खलन संवदनशील क्षेत्रों के चिन्हांकन, भू-उपयोग व उनके वर्गीकरण हेतु किया जा सकता है। उन्होंने भूस्खलन पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित किये जाने की भी वकालत की।
कार्यशाला में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्थान की उत्तराखण्ड इकाई के सुप्रीटेन्डेन्ट भूवैज्ञानिक डा. मृदुल श्रीवास्तव, लैण्डस्लाइड स्टडीज डिविजन, कोलकाता के निदेशक श्री ए.के. मिश्रा, नेशनल रिमोट सेेन्सिंग सेन्टर/इसरो, हैदराबाद के वैज्ञानिक डा. तपस रंजन मार्था, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक पी. के. चम्पतिरे, केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. किशोर कुमार, केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रूड़की के वैज्ञानिक डा. शान्तनु सरकार, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के डा. विक्रम गुप्ता के साथ ही एन.सी.एम.आर.डब्ल्यू.एफ., नोयडा के डा. अभिजीत सरकार ने भूस्खलन न्यूनीकरण पर उत्तराखण्ड एवं अन्य हिमालयी राज्यों के परिप्रेक्ष्य में अपने-अपने अनुभव एवं शोध कार्यों को साझा किया गया। विशेषज्ञों द्वारा भूस्खलन रोकथाम व भूस्खलन सूचना प्रबन्धन के लिये दीर्घकालिक योजना तथा पूर्व चेतावनी तंत्र का एक उपयुक्त स्तर बनाये जाने पर जोर दिया गया।
कार्यशाला में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्थान, केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रूड़की, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, भूतत्व एवं खनिकर्म इकाई, चिकित्सा एवं परिवार कल्याण, राज्य आपदा प्रतिवादन बल, वन, सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग, पुलिस, उच्च शिक्षा, पेयजल, ऊर्जा, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, अग्निशमन, राजस्व विभाग, कृषि, पशुपालन, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, सिविल सोसाइटी, परिवहन विभाग, विश्व बैंक सहायतित परियोजना के अधिकारियों द्वारा प्रतिभाग किया गया।

LEAVE A REPLY