विश्व संवाद केन्द्र द्वारा प्रकाशित ‘हिमालय हुंकार’ पाक्षिक पत्रिका के ‘मेरा भारत और मैं’ विशेषांक का लोकार्पण

0
6549
Reading Time: 1 minute
देहरादून (विसंके) :  व्यक्ति के जीवन को समाज से अलग नहीं देखा जा सकता। एकात्म मानववाद का विचार हमें यही सिखाता है। संस्कार, शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा को केन्द्र में रखकर ही हमें समाज हित में कार्य करने चाहिये, तभी देश के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूर्ण हो सकता है। उक्त विचार आज यहाँ विश्व संवाद केन्द्र द्वारा प्रकाशित ‘हिमालय हुंकार’ पाक्षिक पत्रिका के ‘मेरा भारत और मैं’ विशेषांक के लोकार्पण पर आयोजित एक समारोह में पांचजन्य साप्ताहिक के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार हितेश शंकर ने अपने सम्बोधन में किये।
राजपुर रोड स्थित साईं इन्स्टीट्यूट में आयोजित विश्व संवाद केन्द्र द्वारा प्रकाशित ‘हिमालय हुंकार’ पाक्षिक पत्रिका के विशेषांक ‘मेरा भारत और मैं’ के लोकार्पण अवसर पर आयोजित संगोष्ठी में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं पांचजन्य साप्ताहिक के सम्पादक हितेश शंकर ने कहा कि हमारी सोच व्यक्तिगत न होकर समाज हित में होनी चाहिए। यदि व्यक्ति की सोच समाज हित में होगी तो वह मर्यादित और समाज कल्याण की होगी। उन्होंने मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान राम ने सर्वसमाज को संगठित कर समाज हित में मर्यादित होकर कार्य किये। इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहा गया। श्री हितेश शंकर ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत सभ्यता, संस्कृति, संस्कार व मर्यादाओं का देश है। यहाँ व्यक्तिगत लाभ को महत्व न देकर समाज हित व सामूहिक हितों को ध्यान में रखकर हर व्यक्ति कार्य करता है, जबकि पश्चिमी सभ्यता इसके ठीक विपरीत है। वहाँ संस्कार, मर्यादा व परहित से अधिक स्वहित पर ही ध्यान दिया जाता है। ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करना उनका मुख्य उद्देश्य है। उनकी मनोवृत्ति भौतिकवाद, पूजीवाद और स्वकेन्द्रित रही है। जोकि समाज में टकराहट का बड़ा कारण है। समाज की इस विकृति को यदि हमे दूर करना चाहते हैं तो रोटी, कपड़ा और मकान, शिक्षा, संस्कार और सम्मान इन छह बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। तभी यह समाज और इस समाज में रहने वाले लोग मर्यादित व संस्कारित आचरण कर पायेंगे।
लोकार्पण समारोह की मुख्य अतिथि अर्जुन परस्कार विजेता एवं प्रख्यात पर्वतारोही डा. हर्षवन्ती बिष्ट  ने अपने सम्बोधन में कहा कि वर्तमान परिपेक्ष्य में ‘मेरा भारत और मैं’ विषय बहुत ही उपयुक्त है और निश्चित रूप से यह विषय स्वयं में चिन्तन का विषय है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति हमारा कुछ उत्तरदायित्व होता है, उसके प्रति यदि हम निस्वार्थ व निष्काम भाव से कार्य करते हैं तो वही हमारा धर्म भी है। हमारे संस्कार, संस्कृति, पाश्चात्य संस्कृति से भिन्न होने के कारण ही हमें उनसे पृथक रखते हैं। हम दूसरों के हित में सोचते हैं। समाज उत्थान की बात करते हैं। प्रकृति को प्रेम करते हैं। समाज से हम जो गृहण करते हैं, उसके बदले में समाज को देने की प्रवृत्ति हमारे धर्म व संस्कारों में है। इसलिए यदि हम धर्म की बात करें तो जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। हमारे यहाँ ‘जीयो और जीने दो’ व ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा रही है जो समाज को एकसूत्र में बांधती है।
इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों द्वारा सामूहिक रूप से दीप प्रज्वलित कर विश्व संवाद केन्द्र की पाक्षिक पत्रिका ‘हिमालय हुंकार’ के ‘मेरा भारत और मैं’ विशेषांक का लोकार्पण किया गया। ज्ञात हो कि हिमालय हुंकार विश्व संवाद केन्द्र का एक वैचारिक प्रकाशन है जोकि वर्तमान में उत्तराखण्ड के लगभग 4000 हजार गांवों में नियमित रूप से प्रसारित हो रहा है। समय-समय पर पत्रिका विभिन्न विषयों पर शोधपूर्ण व ज्ञानवर्धक सामग्री के साथ इसी प्रकार के विशेषांकों का प्रसारण करती है, इसी कड़ी में ‘मेरा भारत और मैं’ भी एक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साईं ग्रुप ऑफ इन्स्टीट्यूट के अध्यक्ष श्री हरीश अरोड़ा ने कहा कि इस प्रकार का आयोजन उनके परिसर में होना सौभाग्य की बात है।उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त करते हुए विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष सुरेन्द्र मित्तल ने कहा कि आज का आयोजन हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण और गरिमामय रहा है।
कार्यक्रम का संचालन हिमांशू अग्रवाल ने किया तथा लोकार्पण समारोह में विश्व संवाद केन्द्र के निदेशक विजय कुमार, सचिव राजकुमार टांक, हिमालय हुंकार पत्रिका के सम्पादक रणजीत सिंह ज्याला, क्षेत्र प्रचार प्रमुख पद्म, किसलय कुमार, सह प्रान्त प्रचार प्रमुख संजय कुमार, सुखराम जोशी, श्रीमती रीता गोयल, डा. अंजलि वर्मा, श्रीमति विनोद उनियाल, निशीथ सकलानी, चन्द्रगुप्त विक्रम, दिनेश उपमन्यु, सतेन्द्र सिंह, बलदेव पराशर, विजय स्नेही, बलवन्त सिंह बोरा, प्रभाकर उनियाल सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

LEAVE A REPLY