हिन्दू तथा हिन्दुत्व, समस्त विश्व को एक परिवार मानता है – मोहन भागवत

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देहरादून-आज सरसंघचालक मोहन भागवत ने विश्वविद्यालयो के कुलपतियों से वार्ता करते हुए संघ स्थापना से पूर्व की, देश तथा समाज की उस समय की परिस्थितियों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि डॉ. हेडगवार जन्मजात देशभक्त थे तथा देश को स्वतंत्र कराने हेतु चलने वाले आंदोलनों तथा क्रांतिकारी गतिविधियों में मनोयोग से हिस्सा लेते थे।
संघ से प्रेरणा लेकर स्वयंसेवको द्वारा देशभर में 13000 सेवा के कार्य चलते है।
एक प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने बताया कि समाज, प्रकृति एवं पर्यावरण में समन्वय रखते हुए हिंदू समाज चलता है। यह हिन्दू विचार दर्शन का एक अंग है। यह विचार हिन्दू जीवन दर्शन का मूल तत्व है।
हिन्दू एक जीवन दर्शन है। कुछ लोग यह समझते है परन्तु कुछ व्यक्ति यह जानकर भी अनजान बनते है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि विश्व भर में जिन देशों में अन्य मत मतावलंबी हो गये वहां उन्हें दबाया गया तथा उनका उत्पीड़न हुआ। हिन्दू समाज ने उनके साथ समानता का तथा मातृभाव का व्यवहार किया।
भारत मे इस्लाम, मतावलंबी कव्वाली गाते है। यह इसलिए है कि पूर्व में उनके पूर्वज हिन्दू थे तथा ईश्वर की आराधना व भावो के कारण भजन तथा कीर्तन करते थे। यही माध्यम उन्होंने इस्लाम मत को स्वीकार करने पर अपनाया।
उन्होंने कहा कि हिन्दू तथा हिन्दुत्व, समस्त विश्व को एक परिवार मानता है।


हिन्दू धर्म मे अलग-अलग मतों के मानने वाले है परन्तु जीवन-दर्शन सभी का एक यही है। इसलिए हम कहते है “असतो मा सदगमय” “सत्यमेव जयते” “धर्मो रक्षति रक्षितः”  “यतो धर्मो ततो विजयं” आदि आदि।
एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि भारतीय देशी गाय हमारी आर्थिकी का महत्वपूर्ण आधार है। गाय से हमे दूध तो मिलता ही है परन्तु गाय का गोबर तथा मूत्र का उपयोग जहां एक ओर कृषि कार्यो में करते है, वही स्वास्थ्य की दृष्टि से  उसका औषधीय उपयोग भी है। वर्तमान समय मे देश तथा विश्व के अनेकों देशो में गाय के गोबर व गौ-मूत्र पर अनुसंधान हो रहे है।
भारत -इंडिया-हिंदुस्तान एक ही है। लेकिन हमारी पहचान भारत से है। इसलिए हम कोई भी भाषा बोले उसमें अपने देश का नाम भारत बोले यही उपयुक्त है। इंडिया हमारा दिया नाम नही।
उन्होंने स्पष्ट किया संघ यह नही कहता कि अन्य मत को मानने वाले यहां से चले जाएं। वे भारत के है। उनके पूर्वज हिन्दू थे। इस बात को समझने की आवश्यकता है। हिन्दू समाज सबल होगा तो वे भी इस बात को स्वीकार करेंगे।कुछ स्वीकार करते है, कुछ नही। बाद में सभी इस बात को स्वीकार करने लगेंगे।
एक प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने बताया कि संघ में अन्य मतावलम्बियों के आने पर प्रतिबंध नही है। वे आना चाहे तो आये।
अपनी पूजा पद्धति कोई भी है लेकिन हम सांस्कृतिक रूप से हिन्दू है इस भाव को अपनाना।
सरसंघचालक जी देश तथा समाज की चिंतन की दिशा तथा किये जा रहे प्रयासों के आकलन के आधार पर कहा कि अगले 10 वर्षो में कश्मीर से पलायन किये पंडित पुनः कश्मीर में पुनर्स्थापित हो जाएंगे, ऐसा लगता है।
बाहरी देशो में चर्च समाप्त हो रहे है। उन्हें बेचा जा रहा है। उनके स्थान पर वहां के लोग मंदिरों का निर्माण कर रहे है क्योंकि यह विचार धीरे-धीरे सब देशो के लोग मानने लगे है कि जहां हिन्दू तथा हिन्दू मन्दिर है, वहां का वातावरण, सुख- समृद्ध तथा शांतिमय हो जाता है।
हिन्दू जीवन-दर्शन के प्रति विश्व में स्वीकार्यता बढ़ रही है।