बढ़ती उम्र का दर्द

0
41646
Reading Time: 1 minute

Written By: Indu Garg, Meerut (U.P)

मानव जीवन में हर उम्र के पड़ाव का अपना महत्व है।अगर हम हर पड़ाव को अच्छे से जिये तो जिंदगी का अलग ही आनंद होगा । जब बच्चा जन्म लेता है तो उसके रोते ही सारा परिवार हँसने लगता है और पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती है उस समय माता पिता का सारा समय उसको संभालने में निकल जाता है माता पिता के लिए उनका सर्वस्व उनकी औलाद होती है। धीरे धीरे बच्चा अपनी दुनिया अलग बनाने लगता है स्कूल में , कॉलेज में लेकिन माँ बाप की दुनिया वह बच्चा ही रहता है। धीरे धीरे समय बदलता है बच्चे अपने पंख फैला कर आसमान में उड़ने लगता है और माँ बाप उम्र के उस पड़ाव पर आ जाते है जब उन्हें बच्चों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।पर बच्चे कैरियर बनाने में व्यस्त होते है।वह घर से दूर रह कर उस ऊँचाई पर पहुँचना चाहता है जहाँ से उसे दुनिया का हर सपना पूरा करने की ताकत हो।पर इस सफर में आगे बढते -बढ़ते उसके और माँ – बाप के बीच दूरियां बढ़ जाती ही। लेकिन माँ -बाप की धुरी बच्चे के इर्द- गिर्द ही घूमती रहती है।हालांकि माँ – बाप भी उसकी तरक्की से बहुत खुश होते है।पर जब दोनो की उम्र ऐसे पड़ाव पर आती है जहाँ उन्हें बच्चों की सबसे ज्यादा जरुरत होती है, खालीपन उन्हें कचोटता है और हर काम करने में असमर्थ हो जाते है।तब माँ – बाप के मन से दबी सी आवाज आती है कि काश बच्चे अपने पास होते तो उन्हें इस दर्द से गुजरना नहीं पड़ता पर उस वक़्त सब कुछ इतना दूर होता है उसे पकड पाना असंभव हो जाता है। माँ -बाप बुढ़ापे में एक दूसरे के कंधे पर सर रख कर सुख- दुःख बाट लेते है। पर जब उनमे से एक रह जाता है तब उस उम्र को काटना मुश्किल हो जाता है। तब भी मन के कोने से दबी सी आवाज आती है कि काश बच्चे पास होते पर सब असंभव होता है।कुछ लोग तो अपनी बढ़ती उम्र से दोस्ती कर लेते है और अपने आप को व्यस्त रखने के लिए सामाजिक सँस्थाओ से जुड़ जाते है और मानव हित के कार्यो में अपना समय लगा देते है।वही कुछ अपनी उम्र का रोना रोते रहते है उम्र का हर पडाव कुछ ना कुछ शिक्षा देता है।हर पड़ाव की यादो से ही माँ- बाप अपना जीवन व्यतीत करते हैं।बचपन की तस्वीरे देखकर उन अनमोल पलो को फिर से जी लेते है।पर जब माँ-बाप का बुढापा आता है तो सब धुंधला हो जाता है।और इसी मोड़ पर अपने आप को हारा हुआ महसूस करते हौ।काश सभी माँ- बाप और बच्चो के बीच समझौता हो जाए कि अभी तो आसमान में पतंग की तरह ऊँची उड़ान भरने का वक़्त है तो हमें ऊँची उड़ान भरने दो पर जब माँ – बाप को जरुरत होगी तब हम अपने घोसले में वापस आ जाएँगे और माँ- बाप को सहारा देंगें । पर आजकल के समय में कितने माँ- बाप को सहारा मिल पाता है यह कहना बहुत मुश्किल होगा ?

 

LEAVE A REPLY