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75 की आयु में मोदी, कार्यान्वयन की कला

admin September 19, 2025 1 minute read
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द्वारा: हसमुख अधिया*

मैंने नरेंद्र मोदी जी के अधीन दो दशकों तक केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न स्तरों पर एक सिविल सेवक के रूप में काम किया है। लेकिन उनके साथ मेरा सबसे करीबी कार्य अनुभव तब रहा, जब मैंने गुजरात में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के रूप में सीधे उनके कार्यालय में दो साल – वर्ष 2004 से 2006 तक – काम किया। उनकी व्‍यापक दूरदर्शिता और भविष्य को देख पाने की क्षमता के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन की कला और मंत्रियों व नौकरशाहों की एक बड़ी टीम से काम करवाने की उनकी क्षमता के बारे में कम ही लोग जानते हैं। प्रबंधन के एक छात्र के रूप में, मैंने इसे करीब से देखा है। मैंने पाया कि प्रबंधन के औपचारिक अध्ययन के बिना भी उन्होंने अपने नेतृत्व में प्रबंधन के कुछ सर्वोत्तम सिद्धांतों का सहज रूप से उपयोग किया है।

सबसे पहले आती है, उपयुक्त कार्य के लिए बिल्‍कुल सही व्यक्ति की पहचान करने की उनकी क्षमता। उनमें किसी भी व्यक्ति में छिपी प्रतिभा को पहचानने की स्वाभाविक क्षमता है और वे ऐसे व्यक्ति को उच्च-स्तरीय पद के लिए चुन लेते हैं। इस प्रक्रिया में वे शायद ही कभी गलत हुए हों। किसी भी पद के लिए सही व्यक्ति का चयन करने के बाद, उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को कार्यकाल की स्थिरता प्रदान की, जो शासन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
फिर बारी आती है उनकी हर मुद्दे की बारीकियों और विस्‍तार में जाने की आदत की। किसी भी मीटिंग में उनके सामने दी गई सभी प्रेजेंटेशन को वह धैर्यपूर्वक सुनते हैं। फिर विषय को समझने के लिए वह सही सवाल पूछते हैं। इसके बाद वह कुछ अनोखे वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं जो प्रतिभागियों को सुखद आश्चर्य से भर देते हैं। वे सभी आश्चर्य करते हैं कि ये बातें उन्हें पहले क्यों नहीं सूझीं। मैंने उन्हें अपने कुछ भविष्यवादी विचारों से शीर्ष सलाहकारों को भी चौंकाते देखा है, जिन्‍होंने इनके बारे में कभी सोचा भी नहीं होता।
मोदी जी भारत सरकार के हर मंत्रालय की समीक्षा बैठकें करते रहते हैं, चाहे वह खेल मंत्रालय हो, आयुष मंत्रालय हो या सामाजिक न्याय मंत्रालय। ये समीक्षा बैठकें विभागों को हर समय बिल्‍कुल सक्रिय रखती हैं। मैंने 2014 से 2018 तक वित्त मंत्रालय में अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान देखा कि उन्होंने उन चार वर्षों के दौरान प्रत्येक मंत्रालय के काम की एक से ज़्यादा बार समीक्षा की।
मोदी जी एक बेहतरीन वक्ता हैं, यह बात तो सभी जानते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जटिल विचारों को नौकरशाहों या मंत्रियों के समूह तक संप्रेषित कर पाने की उनकी क्षमता भी लाजवाब है। वे अपनी बात को सरल शब्दों और उदाहरणों से समझाते हैं।
मोदी जी से जो भी व्यक्तिगत रूप से मिलता है, वह उनकी सुनने की क्षमता से हमेशा प्रभावित होता है। चाहे आप उनसे दस मिनट के लिए मिलें या एक घंटे के लिए, वे आपकी आँखों में देखकर बात करेंगे, कभी भी इधर-उधर देखकर आपको यह एहसास नहीं करवाएंगे कि वे व्यस्त हैं। इतने काम के बोझ तले दबे व्यक्ति के लिए यह एक अद्भुत गुण है। उनके कार्यालय में उनकी मेज पर कागज़ का एक टुकड़ा भी नहीं पड़ा होता। अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने और वर्तमान में जीने की उनकी क्षमता अद्भुत है।
उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनकी इतनी तेज़ याददाश्त देखकर दंग रह जाता है कि उन्‍हें उसका नाम और उसके साथ पहले कभी हुआ संवाद भी याद है। किसी को उसके नाम से पुकारने की उनकी यह कला लोगों को तुरंत ही अपना बना लेती है।

एक बार मैंने उनसे पूछा था कि उन्हें इतने सारे नाम कैसे याद रहते हैं। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि अगर अब वे नाम याद करने की कोशिश करें तो उन्हें 50 नाम भी याद नहीं आएँगे। लेकिन जब वे किसी का चेहरा देखते हैं, तो उसका नाम तुरंत ही उनके दिमाग में उभर आता है। उन्होंने माना कि यह उन्हें ईश्वर का एक वरदान है।

कई बैठकों में उनके साथ हुई मेरी बातचीत में, मैंने उन्हें कभी भी अपनी आवाज़ ऊँची करते या किसी व्यक्ति को डाँटते नहीं देखा। जब चीज़ें उम्मीद के मुताबिक़ आगे नहीं बढ़तीं, तो कभी-कभी वे बिना किसी व्‍यक्ति विशेष का नाम लिए, लोगों के पूरे समूह पर अपनी निराशा ज़रूर व्यक्त कर सकते हैं।
मोदी जी हमेशा ही बहुत से लोगों की पहुँच में रहते हैं। इससे उन्हें कई दृष्टिकोणों को समझने का अवसर मिलता है। वे अपने आस-पास के लोगों के किसी छोटे से समूह तक ही सीमित नहीं रहते। इसलिए किसी के लिए भी उन्हें गुमराह करना मुश्किल है।

उनके कार्यालय में प्रधान सचिव के पद पर कार्यरत होने के नाते, वे हमें कामों की एक लंबी सूची थमा देते थे। उनके साथ आधे घंटे की एक बैठक में ही हमारी डायरी में ‘करने वाले कार्य’ सूची के दो पन्ने भर जाते थे। उनके निर्देश नोट करने के बावजूद, कभी-कभी हम उन्हें रिपोर्ट करना भूल जाते थे। लेकिन वे नहीं भूलते थे। वे हमें फिर से याद दिलाते। उनका तीसरा रिमाइंडर भी इतना विनम्र होता – “हसमुख भाई, फलां चीज़ पर कुछ हुआ?” इतने सौम्य तरीके से इशारा दिए जाने पर हम तुरंत ही अपने काम पर लग जाते थे। बिना गुस्सा या अधीरता दिखाए, कार्यान्‍वयन की यह उनकी कला है।

*लेखक एक आईएएस अधिकारी हैं, जो भारत के वित्त एवं राजस्व सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

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