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श्रमिक अधिकारों के लिए संघर्ष से लेकर राष्ट्र निर्माण हेतु अभूतपूर्व योगदान करने वाले बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर-अर्जुन राम मेघवाल

Admin - Er. Kapil Garg (B.E.Electronics) December 5, 2025 1 minute read
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Written By-अर्जुन राम मेघवाल, केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य मंत्री, भारत सरकार

आज, हम एक विराट व्यक्तित्व के स्वामी और आधुनिक मानव समाज की दिशा निर्धारित करने वाले प्रगतिशील उपायों के पुरोधा बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का 70वां महापरिनिर्वाण दिवस मना रहे हैं। एक विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, दार्शनिक, समाज सुधारक और इन सबसे अधिक एक राष्ट्र-निर्माता के रूप में उनके अथक प्रयासों ने आधुनिक भारत की नींव रखी। उन्होंने केवल भारत के संविधान का मसौदा ही तैयार नहीं किया बल्कि एक ऐसे समावेशी और सशक्त राष्ट्र का खाका भी प्रस्तुत किया जहां प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा हो और सभी को समान अवसर प्राप्त हो सके। इन मूलभूत मूल्यों से प्रेरित होकर मोदी सरकार ने जन कल्याण और सुशासन को बढ़ावा देने वाली कई पहलें की हैं।

27 नवंबर, 2025 को पेरिस स्थित यूनेस्को (UNESCO) मुख्यालय में भारत के संविधान की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर संपूर्ण विश्व डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की आवक्ष प्रतिमा के अनावरण का साक्षी बना। विश्व के गणमान्य व्यक्तियों के समक्ष यह प्रतिमा न केवल भारत के एक नेता के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में बल्कि न्याय के एक सार्वभौमिक प्रतीक के रूप में खड़ी है। पट्टिका पर “भारत के संविधान का शिल्पकार” लिखा है, फिर भी ये शब्द उस व्यक्ति की विरासत का पूरी तरह से उल्लेख नहीं कर सकते, जिसने न केवल भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया, बल्कि एक पूरे राष्ट्र को समग्रतः आकार देने में मदद की।

अपने पूरे जीवनकाल में, बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के अधिकार और उनके कल्याण की वकालत करते हुए न्याय के लिए संघर्ष किया। गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में दलित वर्गों (Depressed Classes) के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने जीवन निर्वाह मजदूरी, काम करने की उचित स्थिति, दमनकारी जमींदारों से किसानों की मुक्ति और दबे-कुचले लोगों को प्रभावित करने वाली सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन की पुरजोर वकालत की। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से श्रमिकों और दलितों की पीड़ा को देखा था। बंबई में, वह बंबई डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की एक कमरे वाली चॉल (tenements) में मिल मजदूरों के साथ 10 साल से अधिक समय तक रहे, जहाँ कोई आधुनिक सुविधाएँ नहीं थीं और प्रत्येक मंजिल पर सभी उद्देश्यों के लिए केवल एक शौचालय और एक नल था। इन परिस्थितियों ने उन्हें श्रमिकों के जीवन को काफी नजदीक से समझने का अवसर दिया। उन्होंने आम जनता को एकजुट किया और 1936 में भूमिहीन लोगों, गरीब काश्तकारों, कृषकों और श्रमिकों के कल्याण हेतु एक व्यापक कार्यक्रम के साथ इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (ILP) की स्थापना की। 17 सितंबर, 1937 को बंबई विधानसभा के पुणे सत्र के दौरान, उन्होंने कोंकण में ‘खोती’ भूमि कार्यकाल प्रणाली को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया। 1938 में, उन्होंने बंबई में काउंसिल हॉल तक किसानों के मार्च का नेतृत्व किया और किसानों, श्रमिकों और भूमिहीनों के लोकप्रिय नेता बन गए। वह कृषि काश्तकारों की दासता (बंधुआ मजदूरी) को समाप्त करने के लिए विधेयक पेश करने वाले पहले भारतीय विधायक थे। उन्होंने औद्योगिक विवाद विधेयक (Industrial Disputes Bill), 1937 का भी कड़ा विरोध किया क्योंकि इसमें श्रमिकों के हड़ताल करने के अधिकार में कटौती की गई थी।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अनिश्चित वैश्विक व्यवस्था के दौर में डॉ. अंबेडकर ने वायसराय की कार्यकारी परिषद के श्रम सदस्य के रूप में भारत में मजदूरों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार होने और उद्योगों का विस्तार होने पर उद्यमियों को समृद्धि के अवसर मिले, लेकिन श्रमिकों को उनका उचित हिस्सा नहीं दिया गया। उस समय डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण उपाय पेश किए, जिससे सरकार की श्रम नीति की नींव पड़ी। उन्होंने श्रमिकों से जुड़े जटिल मुद्दों का बहुत दक्षता के साथ समाधान निकाला जिससे उन्हें कर्मचारियों व नियोक्ताओं दोनों से सम्मान प्राप्त हुआ।

वर्ष 1943 में बंबई से आकाशवाणी से किए गए अपने संबोधन में डॉ. अंबेडकर ने श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित “जीवन की उचित स्थिति” सुरक्षित करने का आग्रह किया। उनके प्रयासों से श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने में मदद मिली। उन्होंने प्रमुख श्रम कानूनों के माध्यम से श्रमिकों के कल्याण हेतु अहम योगदान किया जिसमें युद्ध चोट (मुआवजा बीमा) विधेयक, असुरक्षित निरीक्षणों के कारण मिलों में होने वाली मृत्यु पर रोक लगाने से संबंधित बॉयलर (संशोधन) विधेयक 1943, भारतीय खान और ट्रेड यूनियन संशोधन विधेयक, खनिक मातृत्व लाभ संशोधन विधेयक, कोयला खान सुरक्षा (स्टोविंग) संशोधन विधेयक और कामगार मुआवजा संशोधन विधेयक शामिल हैं।

9 दिसंबर 1943 को, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने धनबाद कोयला खदानों का दौरा किया और खदानों के संचालन व श्रम स्थितियों का निरीक्षण करने के लिए जमीन से 400 फीट नीचे गए। इसके परिणामस्वरूप जनवरी 1944 का कोयला खान श्रम कल्याण अध्यादेश (Coal Mine Labour Welfare Ordinance) आया, जिससे श्रमिकों के कल्याण के लिए एक कोष बनाया गया। उन्होंने कोयले की खानों से निकाले गए कोयले पर कर को दोगुना करके इस कोष को मजबूत किया, जिससे खनिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षा उपाय सुनिश्चित हुए। 8 नवंबर 1943 को, उन्होंने भारतीय ट्रेड यूनियन (संशोधन) विधेयक भी पेश किया, जिसमें नियोक्ताओं के लिए ट्रेड यूनियनों को मान्यता देना अनिवार्य कर दिया गया।

8 फरवरी 1944 को कोयला खदानों में महिलाओं के जमीन के भीतर काम पर से प्रतिबंध हटाने के विषय पर विधानसभा में बहस के दौरान डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा, “मुझे लगता है कि यह पहली बार है कि किसी भी उद्योग में लैंगिक आधार पर भेदभाव के बिना समान काम के लिए समान वेतन का सिद्धांत स्थापित किया गया है।” यह देश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था। माइन्स मैटरनिटी बेनिफिट (संशोधन) बिल 1943 के माध्यम से उन्होंने मातृत्व लाभ को मजबूत किया और उन्हें अनुपस्थिति के कारण आर्थिक दंड से बचाने का प्रावधान किया। वर्ष 1945 में उन्होंने अधिनियम में और संशोधन किए ताकि महिलाओं को प्रसव से दस सप्ताह पहले जमीन के भीतर कार्य करने से बचाया सके और उनके लिए प्रसव से दस सप्ताह पहले और चार सप्ताह बाद कुल मिलाकर चौदह सप्ताह का मातृत्व अवकाश सुनिश्चित किया जा सके।

26 नवंबर 1945 को नई दिल्ली में भारतीय श्रमिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए, उन्होंने श्रमिकों के प्रति सरकार के दायित्वों की समीक्षा की और श्रमिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के श्रम कानूनों की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। प्रगतिशील श्रम कल्याण कानून की आवश्यकता पर बल देते हुए, उन्होंने कहा:—

” कोई यह कह सकता है कि अंग्रेजों को श्रम कानून की एक उचित संहिता बनाने में 100 साल लग गए, किंतु यह कोई तर्क नहीं है कि हमें भी भारत में 100 साल लगने चाहिए। इतिहास का अध्ययन केवल इस दृष्टि से नहीं किया जाना चाहिए कि दूसरे देशों की गलतियों की नकल कितनी अच्छी तरह की जाए। हम इतिहास का अध्ययन इसलिए करते हैं ताकि यह जान सकें कि लोगों ने क्या गलतियां की है और उनसे कैसे बचा जा सकता है। इतिहास हमेशा एक उदाहरण नहीं होता। अक्सर यह एक चेतावनी होता है।”

अगले दिन उसी सम्मेलन में, उन्होंने कारखानों में काम के घंटे घटाकर 48 घंटे प्रति सप्ताह करने, वैधानिक औद्योगिक कैंटीन शुरू करने और कामगार मुआवजा अधिनियम, 1934 में संशोधन करने के लिए कानून प्रस्तावित किया। उन्होंने न्यूनतम मजदूरी और भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 में संशोधन के लिए कानूनों का मसौदा तैयार करने की योजना भी घोषित की। 21 फरवरी 1946 को, डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने साप्ताहिक काम के घंटों को घटाकर 48 करने, ओवरटाइम दरों को तय करने और सवैतनिक अवकाश प्रदान करने के लिए कारखाना (संशोधन) विधेयक पेश किया। प्रवर समिति (select committee) द्वारा समीक्षा के बाद, अंबेडकर द्वारा समर्थित यह ऐतिहासिक कानून 4 अप्रैल 1946 को पारित किया गया था।

अभ्रक खनन उद्योग में कल्याणकारी गतिविधियों के लिए एक कोष बनाने के लिए उनके द्वारा पेश किया गया अभ्रक खान श्रम कल्याण कोष विधेयक (Mica Mines Labour Welfare Fund Bill), 15 अप्रैल 1946 को पारित किया गया था। इसने बाल और महिला मजदूरों के लिए सुविधाओं और काम करने की स्थितियों में सुधार किया, जिसमें काम के घंटे और मजदूरी के मुद्दे शामिल थे। डॉ. अंबेडकर ने 11 अप्रैल 1946 को न्यूनतम वेतन विधेयक (Minimum Wages Bill) भी पेश किया, जिसमें समान नियोक्ता-श्रम प्रतिनिधित्व वाली सलाहकार समितियों और बोर्डों का प्रस्ताव था। बाद में 9 फरवरी 1948 को इसे कानून का रूप दिया गया।

डॉ. अंबेडकर ने कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले श्रमिक आंदोलन का विरोध किया, उन्होंने उत्पादन के सभी साधनों को नियंत्रित करने के मार्क्स के सर्वसत्तावादी दृष्टिकोण (totalitarian approach) को खारिज कर दिया। वह मार्क्स के इस विचार से असहमत थे कि निजी संपत्ति को खत्म करने से गरीबी और पीड़ा समाप्त हो जाएगी। अपने निबंध ‘बुद्ध या कार्ल मार्क्स’ में, वह लिखते हैं:—

“क्या कम्युनिस्ट यह कह सकते हैं कि अपने मूल्यवान उद्देश्य को प्राप्त करने में उन्होंने अन्य मूल्यवान उद्देश्यों को नष्ट नहीं किया है? उन्होंने निजी संपत्ति को नष्ट कर दिया है। यह मानते हुए कि यह एक मूल्यवान उद्देश्य है, क्या कम्युनिस्ट यह कह सकते हैं कि इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में उन्होंने अन्य मूल्यवान उद्देश्यों को नष्ट नहीं किया है? अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कितने लोगों को मारा है। क्या मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है? क्या वे मालिक की जान लिए बिना संपत्ति नहीं ले सकते थे?”

संविधान का मसौदा तैयार करते समय, डॉ. अंबेडकर ने एकसमान कानून और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ संरेखण सुनिश्चित करने के लिए श्रम को समवर्ती सूची (Concurrent List) में रखा। उनकी दूरदर्शिता ने संविधान में बंधुआ मजदूरी को अवैध घोषित करके उसे समाप्त कर दिया।

हमारे दूरदर्शी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा दिए गए “Reform, Perform and Transform” मंत्र से प्रेरित होकर तथा डॉ. अंबेडकर के मूल्यों का अनुसरण करते हुए हमारी सरकार ने चार व्यापक श्रम संहिताओं (labour codes)—मजदूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति—को लागू किया है। इन सुधारों का उद्देश्य सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना, श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना, उत्पादकता को बढ़ावा देना, नौकरियां पैदा करना और वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ की दिशा में भारत की आर्थिक समृद्धि को मजबूत करना है। फरवरी 2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना, असंगठित श्रमिकों के लिए वृद्धावस्था सुरक्षा प्रदान करती है, तथा मातृत्व संशोधन अधिनियम, 2017 द्वारा मातृत्व अवकाश को 12 से बढ़ाकर 26 सप्ताह किया गया है और क्रेच सुविधाओं को अनिवार्य बनाया गया है।

‘श्रमेव जयते’ की स्थायी भावना से निर्देशित होकर हम राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों के अनगिनत योगदान को सम्मानित करते हैं। परम पूज्य बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस हमें इस महान राष्ट्र-निर्माता के दृष्टिकोण और कार्यों पर विचार करने का एक उपयुक्त अवसर प्रदान करता है। उनके आदर्श हमें राष्ट्र की विकास यात्रा को तीव्रतर बनाने तथा वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सदैव प्रेरित करते रहेंगे।

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