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बड़े पैमाने पर अवसंरचना का विकास : विकसित भारत की डगर पर अग्रसर भारत – सुमिता डावरा

Admin - Er. Kapil Garg (B.E.Electronics) January 5, 2026 1 minute read
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जीडीपी को बढ़ावा देने, रोजगार के अवसरों का सृजन करने और अर्थव्यवस्था पर गुणक प्रभाव डालने में अवसंरचना पर व्‍यय के विशिष्‍ट महत्व को पहचानते हुए केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक में बुनियादी ढाँचे से संबंधित पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि की है। यह व्यय वर्ष 2014-15 में लगभग 2 ट्रिलियन रुपये से पाँच गुना से भी अधिक बढ़कर वर्ष 2024-25 में 11.1 ट्रिलियन रुपये हो गया। हाल के रुझान इंगित करते हैं कि बुनियादी ढाँचे से संबंधित पूंजीगत व्यय में 38 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक दर से वृद्धि हो रही है, जिसमें भौतिक और डिजिटल दोनों प्रकार के ढाँचागत नेटवर्क के विकास पर स्पष्ट रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है।
बड़े पैमाने पर किए गए इन आवंटनों का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि बुनियादी ढाँचे से संबंधित परियोजनाएँ समयबद्ध रूप से और कुशल गति से आगे बढ़ें तथा उनमें समय और लागत की अधिकता न हो। निर्माण की लंबी अवधि के कारण ऐसी परियोजनाओं के लिए न केवल पर्याप्‍त और निरंतर वित्तपोषण की आवश्यकता होती है, बल्कि भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृतियों तथा सामाजिक-आर्थिक पहलुओं से संबंधित अनुमतियों के समय पर मिलने पर भी निर्भर रहना पड़ता है । इन स्वीकृतियों में अनेक नियामक प्राधिकरणों, स्थानीय निकायों और जिला-स्तरीय प्रशासन की भागीदारी होती है, जिससे परियोजना के सफल क्रियान्वयन के लिए तालमेल और समय पर निर्णय लेना महत्‍वपूर्ण हो जाता है।
ढाँचागत परियोजनाओं के लिए प्रभावी समन्वय और समय पर स्वीकृतियाँ मिलना सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2015 में प्रगति (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन) पोर्टल की शुरुआत की। प्रगति एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो बड़े पैमाने की ढाँचागत परियोजनाओं की वास्तविक समय में निगरानी करता है तथा कार्यान्वयन एजेंसियों, मंत्रालयों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अद्यतन जानकारी प्राप्त करता है। प्रधानमंत्री हर महीने उच्च-स्तरीय समन्वय बैठकों की अध्यक्षता करते हैं, जिनमें कार्यान्वयन में विलंब का सामना कर रही परियोजनाओं का चयन किया जाता है, मंत्रालयों, राज्यों और अन्य संबंधित प्राधिकरणों के साथ सीधे संवाद कर बाधाओं की पहचान की जाती है तथा उनके समाधान के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।
इस प्रकार, प्रगति पोर्टल एक ऐसे तंत्र के रूप में कार्य करता है, जो समय और लागत में वृद्धि का सामना कर रही लंबित परियोजनाओं को गति प्रदान करता है—उदाहरण के तौर पर, नगर निगम से भूमि स्वीकृति न मिलने के कारण किसी मेट्रो रेल परियोजना का वर्षों तक विलंबित रहना, अथवा किसी बड़ी गैस पाइपलाइन परियोजना का कई विविध राज्यों में भूमि संबंधी अड़चनों से जूझना, अथवा लंबे समय से पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रही परियोजनाएँ आदि। 31 दिसंबर 2025 को प्रधानमंत्री ने प्रगति की 50वीं बैठक की अध्यक्षता की। इस एकल बैठक में 40,000 करोड़ रुपये के कुल निवेश वाली पाँच महत्वपूर्ण ढाँचागत परियोजनाओं की समीक्षा की गई। कुल मिलाकर, प्रगति तंत्र के माध्यम से अब तक कुल 85 ट्रिलियन रुपये मूल्य की अटकी हुई परियोजनाओं को शीघ्रता से आगे बढ़ाने में सहायता मिली है।
प्रगति के अनुभव से प्राप्त जानकारी—विशेष रूप से ऐसी बाधाएँ जो बार-बार उत्‍पन्‍न होती हैं और परियोजनाओं की पूर्णता में देरी और अक्सर लागत में वृद्धि का कारण बनती हैं—को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने अक्टूबर 2021 में पीएम गति शक्ति (पीएमजीएस) राष्ट्रीय मास्टर प्लान (एनएमपी) की शुरुआत की। पीएमजीएस एक जीआईएस-आधारित ढाँचा प्रदान करती है, जिसके माध्यम से अवसंरचना, आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र के मंत्रालयों तथा देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त डेटा लेयर्स को एक साथ लाकर समेकित अवसंरचना योजना बनाई जाती है। यह डिजिटलीकृत, डेटा-आधारित इंटरफेस योजनाकारों को ढाँचागत परिसंपत्तियों, संसाधनों, केबलों और ग्रिडों सहित अन्य परिसंपत्तियों को समग्र दृष्टिकोण से देखने में सक्षम बनाता है, जिससे देश में बुनियादी ढाँचे से संबंधित कनेक्टिविटी की वैज्ञानिक एवं समन्वित योजना संभव हो पाती है।
डेटा की सहज दृश्यता उपलब्ध कराकर योजना निर्माण में समन्वित दृष्टिकोण को सक्षम बनाते हुए, पीएमजीएस योजना चरण में ही आवश्यक स्वीकृतियों की शीघ्र पहचान की सुविधा प्रदान करती है। इससे बुनियादी ढाँचे से संबंधित परियोजनाओं की सहयोगपूर्ण योजना संभव होती है और उन महीनों की बचत होती है जो अन्यथा अनुमोदन प्राप्त करने में व्यर्थ हो जाते। यह परिवर्तनकारी योजना दृष्टिकोण न केवल गति और दक्षता को बढ़ाता है, बल्कि मौजूदा अवसंरचना परिसंपत्तियों की अनावश्यक पुनरावृत्ति को भी रोकता है तथा परिवहन के विभिन्न माध्यमों के बीच परिसंपत्तियों की परस्पर पूरकता सुनिश्चित करता है—इस प्रकार अवसंरचना योजना में अनेक परिवहन माध्यमों के संयोजन को अंतर्निहित करता है। इसके परिणामस्वरूप परियोजनाओं को इस प्रकार डिज़ाइन किया जाता है कि वे भारत के विकास क्लस्टरों को अधिक प्रभावी ढंग से बाज़ारों से जोड़ सकें, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आती है। फलस्वरूप, अवसंरचना योजना न केवल अधिक कुशल बनती है, बल्कि लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन को सुदृढ़ करने वाले परिणाम भी प्रदान करती है—जो जीवन की सुगमता और व्यापार करने की सुगमता दोनों को समर्थन देती है।
उदाहरण के तौर पर, जब पीएमजीएस पोर्टल पर जगदीशपुर–हल्दिया एवं बोकारो–धामरा पाइपलाइन परियोजना की योजना बनाई जा रही थी, तो योजना चरण में ही दो प्रमुख मुद्दों की पहचान की गई। इनमें स्पर लाइन के एक छोटे हिस्से के लिए वन विभाग से आवश्यक स्वीकृति तथा 83 किलोमीटर लंबाई के लिए मुआवज़े के भुगतान का लंबित रहना शामिल था। इससे योजना प्राधिकरणों को परियोजना को स्वीकृति हेतु प्रस्तुत करने से पहले ही इन मुद्दों की आसानी से पहचान कर उनका समाधान करने में सहायता मिली।
इसी प्रकार, जीआईएस पोर्टल पर गोवा–कर्नाटक सीमा से कुंडापुर खंड तक राष्ट्रीय राजमार्ग के चार-लेन निर्माण की योजना बनाते समय, सड़क को जिन भू-भागों से होकर गुजरना था, वहाँ भूमि स्वामित्व से संबंधित डेटा गुणों के साथ बस्तियों की स्पष्ट दृश्यता के कारण सड़क अतिक्रमण को एक संभावित चुनौती के रूप में पहचाना गया। वहीं, पीएमजीएस पोर्टल पर मुंबई शहरी परिवहन परियोजना (एमयूटीपी) – चरण 2 की योजना के दौरान, रेल मंत्रालय छोटे-छोटे भूखंडों से संबंधित लंबित भूमि अधिग्रहण को पहले ही देख सका, जिनमें आगे चलकर परियोजना के प्रारंभ के बाद विलंब की संभावना थी।

इस प्रकार, योजना से जुड़ी एजेंसियाँ प्रगति के सिद्धांतों के अनुरूप पीएमजीएस तंत्र का उपयोग परियोजना की योजना और क्रियान्वयन में अधिक दक्षता और गति लाने के लिए कर रही हैं। भारतीय रेलवे ने पीएमजीएस पोर्टल पर अपने महत्वाकांक्षी ऊर्जा गलियारे की योजना बनाई है, जिसमें कोयला उत्पादन क्षेत्रों को थर्मल पावर प्लांटों के खपत बिंदुओं से जोड़ने वाला समर्पित रेल नेटवर्क शामिल है, ताकि देश में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। जीआईएस-पोर्टल के माध्यम से इन मार्गों पर जाम की स्थिति की पहचान की गई और ऊर्जा सामग्री के निर्बाध परिवहन के लिए मार्ग को मजबूत करने की योजना बनाई गई।
गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान ने लद्दाख और हरियाणा के बीच हरित ऊर्जा गलियारे की योजना बनाने में भी मदद की। इससे लद्दाख के उच्च ऊँचाई वाले क्षेत्र में उत्पन्न सौर ऊर्जा को उत्तरी मैदानों तक पहुँचाने की सुविधा मिली, जिसमें भौगोलिक चुनौतियों को पार करते हुए, ट्रांसमिशन लाइनों का वन और वन्यजीव पर्यावासों के साथ न्यूनतम संपर्क सुनिश्चित किया गया—इस प्रकार उन मुद्दों को टाला जा सका, जो परियोजनाओं में संभावित विलंब का कारण बन सकते थे।
चाहे यह हजारों करोड़ रुपये के निवेश वाली बड़ी एक्सप्रेसवे परियोजनाएँ हों, वाराणसी और कानपुर जैसे प्रमुख शहरों में शहरी लॉजिस्टिक्स पहल हों, या प्रमुख बंदरगाहों और उनके अंतर्गत क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी सुधारना हो—गति शक्ति के सिद्धांत परियोजना के योजना चरण में ‘संपूर्ण सरकार’ दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रहे हैं। विविध डेटा-लेयरों में बढ़ी हुई दृश्यता योजना की दक्षता को सुधार रही है, पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में व्यवधान को न्यूनतम कर रही है, ऐसी भूमि के अधिग्रहण को टाल रही है, जिस पर आगे चलकर मुकदमेबाज़ी हो सकती है और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अवसंरचना की योजना बनाने की सुविधा प्रदान कर रही है।
ढाँचागत परियोजनाओं की समन्वित समीक्षा, निगरानी और उनमें तेजी लाने में प्रगति तंत्र की सफलता के आधार पर और पीएम गति शक्ति द्वारा अवसंरचना कार्यान्वयन में अधिक समेकित और योजनाबद्ध दृष्टिकोण प्रदर्शित किए जाने के साथ ही भारत अब अपनी आर्थिक कूटनीति के तहत वैश्विक स्तर पर अपनी सीख को साझा करने के लिए अच्छी स्थिति में है। जो अधिक कुशल और समन्वित ढाँचागत योजना का मॉडल प्रस्तुत करता है, जो डेटा-आधारित, समन्वित है और जिसकी बदौलत उसका समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है।

[लेखिका:सुमिता डावरा, भारत सरकार में केंद्रीय श्रम सचिव और विशेष सचिव (लॉजिस्टिक्स) पद पर रही हैं]

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