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परिवार ही पहला विद्यालय – माँ के संस्कारों से बनता है राष्ट्र का चरित्रः मुख्यमंत्री धामी

admin February 17, 2026 1 minute read
परिवार ही पहला विद्यालय – माँ के संस्कारों से बनता है राष्ट्र का चरित्रः मुख्यमंत्री धामी
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देहरादून-मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज राजकीय दून मेडिकल कॉलेज, पटेल नगर, देहरादून में विश्वमांगल्य सभा के तत्वाधान में आयोजित ‘मातृ संस्कार समागम’ कार्यक्रम में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर उन्होंने प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आई मातृशक्ति का अभिनंदन करते हुए उनके प्रति सम्मान प्रकट किया।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने बचपन और निजी जीवन के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि उनका जीवन किसी विशेष सुविधा या संसाधनों से नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन और संस्कारों की पूंजी से बना है। साधारण परिवार में पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने प्रारंभ से ही मेहनत, ईमानदारी और आत्मनिर्भरता का महत्व समझा। उन्होंने बताया कि सीमित संसाधनों के बीच बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का संकल्प ही उनके व्यक्तित्व की असली ताकत बना।

मुख्यमंत्री ने कहा कि साधारण जीवन शैली ने उन्हें जमीन से जुड़े रहने की सीख दी। सादगी, संयम और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना ने उनके विचारों और निर्णयों को आकार दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जीवन में ऊँचा पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि मजबूत चरित्र और स्पष्ट उद्देश्य ही व्यक्ति को महान बनाते हैं। यही मूल्य आज भी उनके हर निर्णय और कार्यशैली का आधार हैं।मुख्यमंत्री  श्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि उन्हें इस विशेष कार्यक्रम के माध्यम से प्रदेशभर से पधारी माताओं और बहनों के बीच उपस्थित होने का अवसर प्राप्त हुआ। मुख्यमंत्री ने प्रसन्नता व्यक्त की कि इस आयोजन के माध्यम से देश-प्रदेश के जनप्रतिनिधियों, सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत परिवारों की मातृशक्ति, विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाली नारीशक्ति तथा प्रदेश की बेटियों के साथ सार्थक संवाद स्थापित किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह आयोजन समाज और राष्ट्र के विकास में मातृशक्ति की भूमिका को और अधिक सशक्त एवं व्यवहारिक रूप से समझने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

मुख्यमंत्री श्री धामी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माता का स्थान सर्वाेच्च माना गया है। मातृशक्ति को परिवार की धुरी बताते हुए उन्होंने कहा कि परिवार समाज की मूल इकाई है और यदि परिवार सशक्त होगा तो समाज और राष्ट्र भी सशक्त होंगे। उन्होंने विश्वमांगल्य सभा द्वारा मातृशक्ति और पारिवारिक मूल्यों को रेखांकित करने के निरंतर प्रयासों की सराहना की तथा सभी कार्यकर्ताओं और जुड़ी हुई मातृशक्ति के प्रति आभार व्यक्त किया।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि हमारी सांस्कृतिक परंपराओं, धर्मग्रंथों और ऐतिहासिक घटनाओं में माता द्वारा दिए गए संस्कारों का अद्वितीय महत्व रहा है। उन्होंने प्रभु श्रीराम एवं माता कौशल्या, भगवान श्रीकृष्ण एवं माता यशोदा तथा छत्रपति शिवाजी महाराज एवं माता जीजाबाई के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन महान विभूतियों के व्यक्तित्व निर्माण में मातृ संस्कारों की निर्णायक भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि माता द्वारा दिए गए संस्कार ही व्यक्ति के चरित्र, विचार और व्यवहार की नींव रखते हैं तथा उनमें नैतिकता, धैर्य, सहनशीलता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते हैं।
मुख्यमंत्री श्री धामी ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके जीवन में भी उनकी माताजी द्वारा दिए गए संस्कारों और मूल्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि समय के साथ पारिवारिक संरचना में व्यापक परिवर्तन आए हैं। संयुक्त परिवारों का स्वरूप सीमित हुआ है और एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ा है। सुविधा और स्वतंत्रता के साथ-साथ सामूहिकता और आत्मीयता का भाव भी कहीं न कहीं प्रभावित हुआ है।
मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली, व्यस्तता और प्रतिस्पर्धा के कारण परिवारों के बीच संवाद में कमी आई है। विवाह-विच्छेद की बढ़ती घटनाएं और परिवार संस्था से दूर जाने की प्रवृत्तियां सामाजिक बदलाव का संकेत हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है, किन्तु परिवार की मूल भावना-त्याग, सहयोग, जिम्मेदारी और भावनात्मक जुड़ाव-को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
मुख्यमंत्री ने आधुनिकता और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए ‘कुटुंब प्रबोधन’ की अवधारणा को समय की मांग बताया। उन्होंने कहा कि परिवार केवल सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कारों का प्रथम विद्यालय है, जहां से बच्चे सम्मान, अनुशासन, सहयोग, सहिष्णुता और राष्ट्रभाव जैसे मूल्य सीखते हैं।
मुख्यमंत्री श्री धामी ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर इस प्रकार के कार्यक्रम विशेष महत्व रखते हैं और समाज में सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्जागरण को नई दिशा देते हैं। मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वमांगल्य सभा द्वारा आयोजित यह वैचारिक संवाद मातृशक्ति को नई ऊर्जा और आत्मविश्वास प्रदान करेगा तथा समाज और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को और सुदृढ़ करेगा।
अंत में मुख्यमंत्री ने कहा कि मातृशक्ति में वह सामर्थ्य है जिसके बल पर वे न केवल अपने परिवार को सशक्त बना सकती हैं, बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण में भी निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए श्रीमती गीता धामी ने कहा कि सामाजिक सेवा ही मानवीय जीवन का मूल है और जब सेवा किसी परिवार की परंपरा बन जाती है तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे समाज की चेतना को जागृत करता है।
उन्होंने कहा कि हमारी सनातन संस्कृति में ‘सेवा परमो धर्मः’ का भाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की वास्तविक साधना है। उन्होंने उपस्थित सेवा-समर्पित परिवारों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे परिवारों ने सेवा को अपने जीवन का संस्कार बनाया है। जब परिवार के सदस्य समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के प्रति संवेदनशील होते हैं और जरूरतमंदों के दुःख को अपना दुःख समझते हैं, तभी समाज में करुणा, समरसता और मानवीय मूल्यों की स्थापना संभव होती है।
श्रीमती धामी ने भारतीय संस्कृति में माँ की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि माँ केवल स्नेह की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि समाज निर्माण की आधारशिला है। वही प्रथम संस्कारदाता होती है, जो बच्चों के मन में सेवा, त्याग और संवेदना के बीज बोती है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि प्रत्येक परिवार अपनी अगली पीढ़ी को सेवा भाव से जोड़ दे, तो असंवेदनशीलता, स्वार्थ और सामाजिक विघटन जैसी समस्याएं स्वतः ही कम हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति और व्यस्त जीवनशैली के कारण परिवारों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। ऐसे समय में सेवा-निष्ठ परिवार समाज के लिए प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आते हैं। उन्होंने कहा कि सफलता का मापदंड केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि समाज के लिए कितना योगदान दिया गया है।
श्रीमती गीता धामी ने कहा कि बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा की भावना नहीं, बल्कि संवेदना, सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व का पाठ भी पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी बनना महत्वपूर्ण है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि बच्चे अच्छे और संवेदनशील नागरिक बनें। परिवार को उन्होंने पहली पाठशाला बताते हुए कहा कि यहीं से समाज को दिशा देने वाले नागरिक तैयार होते हैं।
उन्होंने कहा कि बढ़ती एकल परिवार व्यवस्था और सीमित संवाद के कारण पारिवारिक संबंधों में जो दूरी आ रही है, उसे पाटने में मातृशक्ति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। माताएँ ही घर की सांस्कृतिक धुरी होती हैं, जो बच्चों को रिश्तों का महत्व, बड़ों के प्रति सम्मान और समाज के प्रति कर्तव्य का बोध कराती हैं।
इस अवसर पर उन्होंने सभी परिवारों से आग्रह किया कि वे अपने घरों में संवाद को जीवित रखें, सेवा को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं और बच्चों को समाज के प्रति संवेदनशील बनाएं। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार अपने आसपास के जरूरतमंद परिवारों का सहारा बने, तो समाज की अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः ही संभव है।
श्रीमती धामी ने कहा कि यह वैचारिक संवाद केवल चर्चा का मंच नहीं, बल्कि समाज के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी को स्मरण कराने का अवसर है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस सम्मेलन के माध्यम से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा और प्रेरणा उत्तराखंड सहित व्यापक समाज में सेवा, समर्पण और सामाजिक सद्भाव को और अधिक सुदृढ़ करेगी।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने सप्त मातृ शक्ति सम्मान के तहत 7 विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली श्रीमती ममता राणा, श्रीमती ममता रावत, सुश्री शैला ब्रिजनाथ, साध्वी कमलेश भारती, श्रीमती राजरानी अग्रवाल, श्रीमती मन्जू टम्टा व सुश्री कविता मलासी को सम्मानित किया।
कार्यक्रम में विश्वमांगल्य सभा के पदाधिकारी श्री प्रशांत हरतालकर, डॉ. वृषाली जोशी, श्रीमती पूजा माधव, श्रीमती अनुराधा यादव, विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आई महिलाए, जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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