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पंचायत उन्नति सूचकांक: ग्रामीण परिवर्तन के लिए डेटा-आधारित निर्णय लेने को मजबूत करना-सुशील कुमार लोहानी

Admin - Er. Kapil Garg (B.E.Electronics) January 13, 2026 1 minute read
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भारत के गांवों में एक शांत लेकिन असरदार बदलाव हो रहा है। महाराष्ट्र की एक पंचायत में “महिला-अनुकूल पंचायत” विषय में कम अंक आने पर सीसीटीवी और स्ट्रीट लाइटें लगाई गईं, वहीं गुजरात के एक गांव में “स्वच्छ और हरित पंचायत” श्रेणी में कमजोर प्रदर्शन के बाद तेजी से स्वच्छता अभियान शुरू किए गए।

पंचायत उन्नति सूचकांक (पीएआई) अब यह तय करने लगा है कि जमीनी स्तर पर विकास की योजना कैसे बने और उसे कैसे लागू किया जाए। कई पंचायतों में पीएआई के जरिए सामने आई कमियां जैसे संस्थागत प्रसव की कम संख्या, खराब कचरा प्रबंधन या पानी की कमी के आधार पर सीधे लक्षित कदम उठाए गए हैं।

ये शुरुआती उदाहरण एक सरल लेकिन मजबूत सच्चाई दिखाते हैं-जब पंचायतें अपनी ताकत और कमज़ोरियों को साफ़-साफ़ देख पाती हैं, तो वे ज़्यादा तेज़ी से और सही तरीके से काम करती हैं। कई दशकों तक भारत में ग्रामीण विकास ज़्यादातर हाथ से बनी रिपोर्टों, व्यक्तिगत धारणाओं और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर रहा। आज पंचायत उन्नति सूचकांक (पीएआई) ग्रामीण प्रशासन के केंद्र में एक नया मॉडल लेकर आया है, जो पारदर्शी है, आंकड़ों पर आधारित है और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप है।

पंचायती राज मंत्रालय की ओर से शुरू किया गया पंचायत उन्नति सूचकांक (पीएआई) भारत का पहला देशव्यापी ढांचा है, जिसके माध्यम से ग्राम पंचायतों की प्रगति को वस्तुनिष्ठ संकेतकों के आधार पर मापा जाता है। इसमें स्वच्छता, स्वास्थ्य, शासन, महिला सशक्तिकरण, बुनियादी ढांचा, पर्यावरणीय स्थिरता आदि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल किया गया है। यह मूल्यांकन 17 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) से निकले स्थानीय सतत विकास लक्ष्यों (एलएसडीजी) के नौ विषयों के अंतर्गत किया जाता है।

तर्कसंगत रूप से, राष्ट्रीय स्तर पर एसडीजी की प्राप्ति के लिए स्थानीय स्तर पर कार्यवाही आवश्यक है, जहां पंचायतें अहम भूमिका निभा सकती हैं। इस संदर्भ में, पीएआई ग्रामीण क्षेत्रों में एलएसडीजी और अंततः एसडीजी की प्रगति को मापने और ट्रैक करने के लिए एक साक्ष्य-आधारित व्यवस्था प्रदान करता है।

पंचायत उन्नति सूचकांक (पीएआई) की गणना एक मजबूत और बहु-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से की जाती है, जिसमें नौ विषयों के अंतर्गत 435 अलग-अलग स्थानीय संकेतकों का उपयोग होता है। पंचायती राज मंत्रालय अन्य मंत्रालयों, विभागों और राज्य सरकारों से परामर्श कर संकेतकों का ढांचा तैयार करता है, जबकि वास्तविक आंकड़े ग्राम पंचायतों और संबंधित विभागों द्वारा एक साझा पोर्टल pai.gov.in पर ग्राम पंचायत स्तर पर दर्ज किए जाते हैं।

इन आंकड़ों का सत्यापन कई प्रशासनिक स्तरों पर किया जाता है, जिसमें ग्राम सभा द्वारा जांच भी शामिल है। प्रत्येक विषय का स्कोर इन संकेतकों के आधार पर 0 से 100 के पैमाने पर तय होता है और इन्हीं से कुल पीएआई स्कोर (0–100) बनता है। इसी कुल स्कोर के आधार पर पंचायतों को तुलना के लिए पाँच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

वित्त वर्ष 2022–23 के लिए किए गए पहले सर्वेक्षण से कई रोचक तथ्य सामने आए। सत्यापित आंकड़े जमा करने वाली 2.16 लाख पंचायतों में से कोई भी पंचायत “अचीवर” (90 से अधिक अंक) की श्रेणी में नहीं आई। केवल 0.3% पंचायतें “फ्रंट रनर” (75–89.99 अंक) रहीं और 35.8% पंचायतें “परफॉर्मर” (60–74.99 अंक) की श्रेणी में थी।

सबसे अधिक, यानी 61.2% पंचायतें “आकांक्षी” (40–59.99 अंक) श्रेणी में रहीं, जबकि 2.7% पंचायतें “शुरुआती” (40 से कम अंक) श्रेणी में पाई गई। गुजरात और तेलंगाना जैसे राज्य सबसे अधिक उच्च प्रदर्शन करने वाली पंचायतों के साथ शीर्ष पर रहे।

जमीनी स्तर के शासन को मजबूत करने में इसकी बड़ी क्षमता को देखते हुए, राज्य सरकारें पीएआई अंकों को ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर आयोजित कार्यशालाओं के माध्यम से विभिन्न हितधारकों तक पहुंचा रही हैं। पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता बढ़ाने के लिए पंचायतों ने अपने कार्यालयों के बाहर पीएआई स्कोरकार्ड लगाना भी शुरू कर दिया है।

इसके अलावा, ग्राम सभा की बैठकों के एजेंडे में भी पीएआई अंकों पर चर्चा को शामिल किया जा रहा है।

पीएआई की असली ताकत इसके व्यावहारिक उपयोग में है। शुरुआती संकेत बताते हैं कि गुजरात जैसे राज्य पीएआई अंकों का उपयोग कमजोर ग्राम पंचायतों को विशेष अनुदान देने में कर रहे हैं, ताकि महत्वपूर्ण कमियों को पूरा किया जा सके। सिक्किम ने अपने छठे राज्य वित्त आयोग के तहत प्रदर्शन अनुदान देने के लिए पीएआई स्कोर को एक मानदंड के रूप में अपनाने का निर्णय लिया है।

कई राज्यों में पीएआई साक्ष्य-आधारित योजना बनाने का एक अहम साधन बन गया है, जिससे पंचायतों को अपने ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (जीडीडीपी) में प्राथमिक क्षेत्रों की पहचान करने और उन्हें प्राथमिकता देने में मदद मिल रही है। कर्नाटक, तमिलनाडु, सिक्किम, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में उच्च अंक पाने वाली ग्राम पंचायतों को पंचायत लर्निंग सेंटर के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि झारखंड, बिहार, केरल, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्य इन पंचायतों के लिए पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के प्रतिनिधियों के लिए विशेष अध्ययन और अनुभव भ्रमण आयोजित कर रहे हैं।

अब कई राज्य पीएआई के प्रदर्शन को सम्मान और पुरस्कारों से भी जोड़ रहे हैं। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री योजना के तहत बड़े पुरस्कार दिए जाते हैं; सिक्किम और मध्य प्रदेश में वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं, जबकि पंजाब, झारखंड, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में उच्च अंक प्राप्त पंचायतों को राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में सम्मानित किया जाता है। इसके अलावा, पीएआई अंकों को अब संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और क्षेत्रीय कार्यशालाओं में भी तेजी से शामिल किया जा रहा है।

पीएआई ने जटिल सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संकेतकों को आसान और समझने योग्य विषयों में बदल दिया है, जिससे लक्षित योजना बनाने और सही फैसले लेने में मदद मिलती है। डैशबोर्ड, स्कोरकार्ड और डिजिटल उपकरण पंचायत स्तर पर साक्ष्य-आधारित शासन को मजबूत करते हैं।

हालांकि, पीएआई अभी नया है। इसकी पहली आधारभूत रिपोर्ट 2022–23 की है, इसलिए ऐसे लंबे समय के अध्ययन अभी कम हैं जो सीधे और मापने योग्य सुधार दिखा सकें। तकनीकी क्षमता में असमानता, आंकड़ों की सही समझ की कमी और रिपोर्टिंग प्रणालियों में एकरूपता न होने के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में डेटा की गुणवत्ता भी अलग-अलग है। विभागों और पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के बीच समन्वय बेहतर हो रहा है, लेकिन अभी भी यह पूरी तरह सुदृढ़ नहीं है।

ये समस्याएं नहीं, बल्कि अवसर हैं। इन्हीं अनुभवों से सीख लेते हुए मंत्रालय ने पीएआई 2.0 के लिए प्रक्रिया को सरल बनाया है। इसमें विशिष्ट संकेतकों की संख्या 435 से घटाकर 119 कर दी गई है, अधिक प्रासंगिक और परिष्कृत संकेतकों को अपनाया गया है, और कार्यप्रणाली को बेहतर बनाया गया है, जिससे डेटा संग्रह आसान हो और उसकी गुणवत्ता भी सुधरे।

मंत्रालय से जारी स्पष्ट संचालन दिशानिर्देशों और सरल प्रक्रियाओं के कारण इसे लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपनाया है। दूसरे चरण में 2.60 लाख से अधिक पंचायतों की भागीदारी हुई है, जबकि पहले चरण में यह संख्या 2.16 लाख थी, जो एक मजबूत दिशा को दर्शाता है। इसके साथ ही, चुने हुए जनप्रतिनिधियों, पंचायत कर्मियों और संबंधित विभागों के कर्मचारियों में संकेतकों और डेटा बिंदुओं की समझ बढ़ाने के लिए एक व्यापक क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी शुरू किया गया है।

पीएआई की परिवर्तनकारी क्षमता को कम करके नहीं आंका जा सकता। यह डेटा को लोकतांत्रिक बनाता है, जिससे नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से जवाबदेही तय कर सकते हैं और लोकतांत्रिक शासन और मजबूत होता है। यह पारदर्शिता को बढ़ावा देता है और पंचायतों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करता है।

चूंकि विषयवार पीएआई अंक विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कई संकेतकों पर आधारित होते हैं, इसलिए पीएआई अपनी संरचना में ही मंत्रालयों और विभागों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है, ताकि बेहतर विकास परिणाम हासिल किए जा सकें। पीएआई की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप है और इन लक्ष्यों का गांव स्तर पर नवाचारी स्थानीयकरण करता है। विकास को पीएआई अंकों के माध्यम से मापकर यह मॉडल वास्तव में एसडीजी के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारता है, जिससे यह एक अनूठा और संभावित रूप से वैश्विक सर्वोत्तम उदाहरण बनता है।

संक्षेप में, पंचायत उन्नति सूचकांक भारत में ग्रामीण शासन को नए सिरे से परिभाषित करने वाली एक ऐतिहासिक पहल है। यह एक महत्वपूर्ण साधन है, जो साक्ष्य-आधारित, सहभागितापूर्ण और विकेंद्रीकृत विकास योजना के माध्यम से भारत को वर्ष 2030 तक अपने सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करता है।

विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए, जब भारत समान विकास और सामाजिक न्याय के लिए प्रयासरत है, तब पीएआई पंचायतों को डेटा से विकास की ओर, और समझ से वास्तविक प्रभाव की ओर ले जाने वाला एक मार्गदर्शक प्रकाशस्तंभ बनकर खड़ा है।

(*सुशील कुमार लोहानी एक आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय में अपर सचिव के रूप में कार्यरत हैं।)

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