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जीएसटी 2.0 – भारत के वस्त्र क्षेत्र के सपनों को वास्तविकता में बदलने के लिए परिवर्तन का एक सूत्र – गिरिराज सिंह

Admin - Er. Kapil Garg (B.E.Electronics) October 7, 2025 1 minute read
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1 जुलाई, 2017 को भारत में दशकों का सबसे साहसिक आर्थिक सुधार हुआ। मानसून की उस एक सुबह, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने 17 अलग-अलग करों और 13 उपकरों को एक एकीकृत ढांचे के साथ बदल दिया, जिससे मूल रूप से देश की राजकोषीय संरचना को नया आकार मिला। यह केवल एक कर सुधार नहीं था, यह एक राष्ट्र, एक कर, एक बाजार की ओर भारत की साहसिक यात्रा की शुरुआत थी।
आठ साल बाद अब यह परिवर्तन किसी असाधारण घटना से कम नहीं लगता है। कर संग्रह 2017-2018 के 7.19 लाख करोड़ रुपये से तीन गुना बढ़कर 2024-2025 में 22.08 लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड वृद्धि के साथ तीन गुना हो गया है। इसके साथ ही करदाताओं का आधार 65 लाख से दोगुना होकर 1.5 करोड़ हो गया है, जिससे लाखों लघु उद्यमों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल किया जा सका है। इस आधार पर आगे बढ़ते हुए, भारत ने अब 22 सितंबर, 2025 से अगली पीढ़ी के जीएसटी युग में प्रवेश कर लिया है, जिसमें इस प्रणाली को 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत के दो स्लैब में सुव्यवस्थित कर दिया गया है, साथ ही इसमें 40 प्रतिशत की स्लैब लग्जरी और डिमेरिट वस्तुओं के लिए रखी गई है।
घरों में दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएं, दवाओं और शिक्षा सामग्री की आपूर्ति पर 0 से 5 प्रतिशत के बीच कर लगने से परिवारों को अधिक बचत होगी, जबकि किसानों को ट्रैक्टरों, टायरों, कीटनाशकों और सिंचाई उपकरणों पर कम जीएसटी लगने से अधिक लाभ प्राप्त होगा जिससे इनपुट लागत में कमी आएगी और ग्रामीण आय में वृद्धि होगी। इसके साथ ही ऑटो सेक्टर को भी इससे बड़ी राहत मिली है क्योंकि स्कूटर और कारों पर जीएसटी 28 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो गया है। अब 2,500 रुपये तक की कीमत वाले (पहले 1,000 रुपये) रेडीमेड कपड़ों पर भी केवल 5 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। मैंने एक कॉलेज छात्र से बातचीत की और जब उससे कपड़ों के बारे में पूछा तो उसने कहा, “अब त्योहारों की खरीदारी ने मेरी जेब पर पड़ने वाले बोझ को बहुत कम कर दिया है। अब उसी बजट से मैंने एक की बजाय दो ट्रेंडी शर्ट खरीदीं हैं। मुझे जीएसटी स्लैब के बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि अब कपड़े खरीदना अधिक सस्ता हो गया है।” इसके विपरीत, पान मसाला, तंबाकू, ऑनलाइन गेम्स, लग्जरी एसयूवी और कैसिनो जैसे लग्जरी और डिमेरिट सामान अब 40 प्रतिशत स्लैब के अंतर्गत आते हैं। इस सुधार ने ‘फिट इंडिया, हेल्दी इंडिया’ के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करते हुए उत्तरदायी उपभोग को बढ़ावा दिया है, जो बचत का एक वास्तविक स्वरूप है।
और जैसे इन सुधारों से परिवारों, किसानों और उद्योगों को राहत मिलती है, वैसे ही ये हमारे वस्त्र क्षेत्र को भी नई ताकत देते हैं। जीएसटी 2.0 वस्त्र उद्योग के पूर्ण परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है, जो कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार उपलब्ध कराने वाला क्षेत्र है और आत्मनिर्भर भारत का एक जीवंत उदाहरण है।
जीएसटी 2.0, 350 बिलियन डॉलर के वस्त्र उद्योग को नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है
भारत में वस्त्र उद्योग बहुत बड़ा है, जो आजीविका और निर्यात दोनों को प्रभावित करता है। आज, इस उद्योग का आकार 179 बिलियन डॉलर है और यह 4.6 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है, जिनमें से अधिकांश महिलाएं हैं। अब सरकार का लक्ष्य 2030 तक इस उद्योग के आकार को लगभग दोगुना करके 350 बिलियन डॉलर करना है, जिससे देश भर के परिवारों के लिए रोजगार और आय के और भी अधिक और नए अवसर पैदा होंगे।
भारत का संगठित घरेलू वस्त्र बाजार लगभग 142 से 145 बिलियन डॉलर का है और जब हम इसमें बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र को शामिल करते हैं, तो यह 155 से 160 बिलियन डॉलर के करीब हो जाता है। करों की दर को युक्ति संगत बनाने जैसे अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधारों की शुरुआत के साथ एवं फाइबर-तटस्थ व्यवस्था को अपना कर निर्माता अब बचत का लाभ सीधे खरीददारों को दे सकते हैं। उपभोक्ताओं, विशेषकर मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए, जिनका 2047 तक भारत के लक्षित उपभोक्ता आधार का 60 प्रतिशत बनाने की उम्मीद है उनके लिए ये सुधार सबसे बड़ा लाभ लाएंगे। निम्न आय समूहों के साथ मिलकर, स्थानीय उद्योग को समर्थन देते हुए आवश्यक वस्त्रों के अधिक किफायती बनने से हर साल लगभग 8 से 10 बिलियन डॉलर की बचत होने का अनुमान है। ये सुधार कीमतों को कम करने से कहीं बढ़ कर है और यह सही मायनों में फैशन को और अधिक लोकप्रिय बनाने का प्रतिनिधित्व करता है।
वस्त्र क्षेत्र के लिए जीएसटी 2.0 के सबसे बड़े बदलावों में से एक लंबे समय से चले आ रहे इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करना है, जिसने मानव निर्मित फाइबर क्षेत्र को कमजोर कर दिया था। इससे पहले, मानव निर्मित रेशों पर 18 प्रतिशत, सूत पर 12 प्रतिशत और कपड़ों पर केवल 5 प्रतिशत कर लगाया जाता था। इस संरचना ने कच्चे माल को तैयार उत्पादों की तुलना में महंगा बना दिया, जिससे कार्यशील पूंजी अवरुद्ध हो गई और नया निवेश बाधित हुआ। जीएसटी 2.0 में अब मानव निर्मित क्षेत्र में एक समान 5 प्रतिशत कर है, जो सही अर्थों में फाइबर तटस्थ इकोसिस्टम सृजित कर रहा है। लाखों एमएसएमई के लिए, जो भारत के वस्त्र उद्योग का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा हैं, यह एक बड़ी राहत है। यह मानव निर्मित फाइबर क्षेत्र के लिए वैश्विक केंद्र बनने की भारत की महत्वाकांक्षा को मजबूत करता है और प्रतिवर्ष उत्पादित 22,000 मिलियन परिधानों को कम इनपुट लागत, बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा और अधिक बाजार मांग के साथ निर्मित करने में सक्षम बनाता है। यह सुधार न केवल कपड़ों को सस्ता बनाएगा और निर्यात को बढ़ावा देगा, बल्कि मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के सपने को भी मजबूत करेगा, जो हमारी विरासत और विकास दोनों को आगे बढ़ाएगा।

एक उदाहरण से इसे समझते हैं। इससे पहले सूरत में महिलाओं की सिलाई इकाई में मानव निर्मित फाइबर और धागे की लागत इतनी अधिक थी कि उनका लाभ मार्जिन कम हो जाता था और ऑर्डर अक्सर विदेशों में चले जाते थे। अब, जीएसटी 2.0 द्वारा करों को घटाकर एक समान 5 प्रतिशत करने के साथ, उनकी निवेश लागत कम हो गई है, वे अधिक ऑर्डर प्राप्त कर सकते हैं, उचित मजदूरी का भुगतान कर सकते हैं और यहां तक कि अपने व्यवसाय का विस्तार भी कर सकते हैं। इस तरह एक राष्ट्रीय सुधार सीधे आम श्रमिकों और परिवारों के जीवन को प्रभावित करता है।
यह लाभ यहीं खत्म नहीं होते। वाणिज्यिक माल वाहनों पर जीएसटी 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत तथा लॉजिस्टिक्स सेवाओं पर 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने से वस्त्र आपूर्ति श्रृंखला में परिवहन लागत कम हो जाती है। यह सीधे तौर पर पीएम गति शक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति का सहयोग करता है और साथ ही वैश्विक बाजारों में भारतीय वस्त्र निर्यात को मजबूत बनाता है। जीएसटी 2.0 के सुधार एक साथ मिलकर वस्त्र मूल्य श्रृंखला के हर चरण को सशक्त बनाते हैं जैसे फाइबर बनाने से लेकर तैयार परिधान और विदेशी बाजार भेजने तक। इससे देश भर में विकास और रोजगार का सृजन होता है।
आम जनता पर प्रभाव – अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार हर जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं

जीएसटी 2.0 का आर्थिक प्रभाव आम परिवारों के रोजमर्रा के जीवन में महसूस किया जा रहा है। उद्योग जगत का अनुमान है कि इससे प्रत्यक्ष उपभोग में लगभग 1.98 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि होगी, तथा दरों में कमी के कारण परिवारों को प्रतिवर्ष लगभग 48,000 करोड़ रुपये की बचत होगी।
इसे परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, 2014 में यूपीए सरकार के तहत, दैनिक जरूरतों पर प्रति वर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने वाले एक परिवार ने लगभग 25,000 रुपये कर का भुगतान किया था। जीएसटी और जीएसटी 2.0 के बाद आज वही परिवार लगभग 5,000 रुपये से 6,000 रुपये का कर भुगतान करता है। यानी हर साल लगभग 20,000 रुपये की बचत होती है और यह पैसा बच्चों की शिक्षा, बेहतर पोषण और परिवार के कल्याण के लिए वापस परिवार के पास जाता है। आयकर छूट के साथ मिलकर सभी भारतीय परिवारों के प्रतिवर्ष लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपये की बचत का अनुमान है। छोटे शहरों और गांवों में इसका प्रभाव और भी अधिक महत्वपूर्ण है, जहां भारत की लगभग 63 प्रतिशत आबादी रहती है।
बेगूसराय में बाजारों की अपनी हाल के दिनों की यात्रा के दौरान, मैंने जीएसटी सुधारों के सकारात्मक प्रभाव को देखा। खुदरा विक्रेताओं ने कम दरों को ले कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की और ग्राहकों में इन सुधारों को ले कर उत्साह साफ झलक रहा था, क्योंकि त्योहारों के इस मौसम में खरीदारी करने के लिए ग्राहक बड़ी संख्या में आ रहे हैं। बाजारों में ग्राहकों की बढ़ती भीड़ से स्पष्ट है कि ये सुधार किस प्रकार एक जीवंत और सकारात्मक आर्थिक वातावरण का निर्माण कर रहे हैं, जो परिवारों और व्यवसायों दोनों के लिए वास्तविक लाभ है।
मासिक जीएसटी संग्रह जो वित्त वर्ष 2024-25 में 1.85 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया था, अब लगातार 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है। इन सुधारों से न केवल नागरिकों पर वित्तीय बोझ कम हो रहा है, तथा इन कम दरों पर भी राजस्व में वृद्धि जारी रहेगी। यह एक दुर्लभ अवसर है, जहां सुधार जन-केंद्रित और वित्तीय रूप से सुदृढ़ हैं, जो परिवारों को मजबूत बनाते हुए भारत के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित कर रहे हैं।
सामाजिक संरचना – अर्थशास्त्र से आगे सशक्तिकरण तक
जीएसटी 2.0 के वस्त्र क्षेत्र के सुधार सिर्फ आर्थिक परिवर्तन से कहीं अधिक हैं, वे समावेशी विकास के बारे में हैं, जिनका सीधा प्रभाव पूरे भारत के 65 लाख बुनकरों और कारीगरों पर पड़ रहा है। इससे न केवल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद मिलती है बल्कि इस क्षेत्र में काम करने वाली लाखों महिलाओं की आजीविका को भी सहारा मिलता है।
हथकरघा, हस्तशिल्प और कालीन पर जीएसटी को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने से यह पारंपरिक उत्पाद अब भारतीय और वैश्विक दोनों बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी हो गए हैं। साथ ही, सिलाई मशीनों पर जीएसटी को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करना भारत के महिला प्रधान वस्त्र क्षेत्र को प्रत्यक्ष प्रोत्साहन दे रहा है।

पिछले दशक में ग्रामीण आय और व्यय दोगुना से अधिक हो गया है, जो 2011-12 के 1,430 रुपये प्रति माह से बढ़कर 2023-24 में 4,122 रुपये हो गया है। जीएसटी 2.0 के साथ, इस बढ़ती क्रय शक्ति से सीधे भारतीय निर्मित कपड़ों की मांग तेज होगी, जिससे बुनकरों, दर्जनों और परिधान कामगारों के लिए अधिक कार्य सृजित होंगे और इससे विकास का एक चक्र उत्पन्न होगा जिससे समाज का प्रत्येक वर्ग लाभान्वित होगा।
हाल ही में एक कार्यक्रम में, मेरी मुलाकात कई स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) दीदियों से हुई, जिन्होंने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार ने पहले उन्हें लखपति दीदी बनाकर उन्हें सशक्त बनाया और अब जीएसटी सुधारों के माध्यम से आवश्यक वस्तुओं को अधिक किफायती बनाकर तथा आयकर सुधारों के माध्यम से उनके कर के बोझ को कम किया है। उन्होंने कहा कि इस बार की दिवाली उनके परिवारों के लिए अधिक उपहार और आनंदमय उत्सव के साथ वास्तविक खुशी ले कर आई है। ये सुधार अर्थव्यवस्था को तेज गति दे रहे हैं, आय बढ़ा रहे हैं और कर का बोझ कम कर रहे हैं।
ऐसे समय में जब भारत तेजी से आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ा रहा है तब हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र, हमारी स्वयं सहायता समूह दीदियों के साथ मिलकर वोकल फॉर लोकल और स्वदेशी आंदोलन की आत्मा के रूप में खड़ा है। हमारे कारीगर और बुनकर केवल इन परंपराओं को संरक्षित ही नहीं कर रहे हैं बल्कि वे आत्मनिर्भर भारत की ओर देश की यात्रा का वास्तविक आधार भी हैं।
जीएसटी 2.0 और विकसित भारत 2047 की राह जैसे-जैसे भारत अमृतकाल में प्रवेश करते हुए 2047 की तरफ आगे बढ़ रहा है, जीएसटी 2.0 केवल कर सुधार के रूप में ही नहीं, बल्कि विकसित भारत के लिए विकास की रणनीति के रूप में भी हमारे सामने खड़ा है।

By: गिरिराज सिंह, केंद्रीय कपड़ा मंत्री

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